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विभिन्न लग्नों के लिए रत्न / रूद्राक्ष चयन
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प्रत्येक लग्न के लिए एक ग्रह ऐसा होता है जो योगकारक होने के कारण शुभ फलदाई होता है। यदि ऐसा ग्रह कुण्डली में बलवान अर्थात् उच्चराषिस्थ, स्वराषि का या वर्गोत्तमी होकर केन्द्र या त्रिकोण भाव में शुभ ग्रह के प्रभाव में स्थित हो व इस पर किसी भी पाप ग्रह का प्रभाव न हो तो यह अकेला ही जातक को उन्नति देने में सक्षम होता है अतः इसका रत्न धारण करना विषेष शुभ फलदाई तथा चमत्कारी प्रभाव देने वाला होगा परन्तु यदि यह अशुभ भाव में अशुभ ग्रहों के प्रभाव से ग्रस्त हो तो जातक इस योगकारक ग्रह के चमत्कारी प्रभाव से वंचित रह जाता है। ऐसी स्थिति में इसकी अशुभ भाव जनित अशुभता को नष्ट करने हेतु इसके लिये रुद्राक्ष को धारण किया जाना चाहिए। रत्न पहनने से तुरन्त लाभ होता है लेकिन ऐसा माना जाता है कि रत्न धारक को नियमित रूप से पूजा पाठ करना चाहिए। आज कल की भाग दौड़ व अतिव्यस्तता भरी जीवन शैली में कई बार पूजा पाठ आदि के लिए समय दे पाना सम्भव नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में रत्न धारक को सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति हेतु रुद्राक्ष भी धारण करना चाहिए क्योंकि रत्न सकारात्मक ऊर्जा वाले व्यक्ति के लिए अधिक लाभकारी सिद्ध होते हैं। जहां शुभ, योगकारक व बली ग्रहों के प्रभाव को बढ़ाने के लिए रत्न धारण करना चाहिए वहीं अकारक, नीच राषिस्थ व अशुभ भाव में स्थित ग्रह के शुभ फल प्राप्यर्थ रुद्राक्ष धारण करना श्रेष्ठ होता है।

मेष- इन्हें सूर्य का रत्न माणिक्य धारण करना चाहिए व तीनमुखी तथा पंचमुखी रुद्राक्ष भी पहनना चाहिए। जिन जातकों की पत्री में सूर्य शुभ प्रभाव में बली होकर बैठा है उन्हें यश, मान, कीर्तिलाभ व सत्ता की प्राप्ति होगी तथा जिनका सूर्य अशुभ भाव में बैठा है उन्हें नौकरी रोजगार व राजदण्ड आदि समस्याओं के निराकरण में सफलता प्राप्त होगी। आपके लिए सूर्य, चन्द्र मंगल व गुरु योगकारक ग्रह हैं। अतः इनके लिए माणिक्य, मोती, मूंगा व पुखराज धारण कर सकते हैं लेकिन मंगल अष्टमेश है अतः मंगल के लिए 3 मुखी रुद्राक्ष स्वास्थवर्धक हो सकता है। गुरु के लिए द्वादशेश होने के कारण पंचमुखी रुद्राक्ष धारण करना समृद्धि कारक होगा। बुध, शुक्र व शनि इस लग्न के लिए बाधाकारक हैं अतः इन ग्रहों के लिए रत्न धारण न कर 4 मुखी, 6 मुखी व 7 मुखी रुद्राक्ष धारण करना श्रेष्ठ है। यदि सूर्य, चन्द्र भी छठे, आठवें एवं बारहवें स्थान पर आ जाते हैं तो रत्न की अपेक्षा 1 मुखी व 2 मुखी रूद्राक्ष धारण करना ही श्रेष्ठ है। Read more Ratan & Rudraksha

वृष- वृष लग्न के लिए शनि, शुक्र व बुध योगकारक हैं इसलिए नीलम, हीरा व पन्ना पहनना आपके लिए शुभ है। अष्टमेश गुरु एवं द्वादशेश मंगल के अषुभ प्रभाव से मुक्ति हेतु 5 मुखी एवं 3 मुखी रूद्राक्ष धारण करें। सूर्य व चन्द्रमा भी इस लग्न के लिए बाधाकारक है इसलिए इनके लिए भी 1 मुखी व 2 मुखी रुद्राक्ष धारण करें। शनि, शुक्र व बुध भी यदि छठे, आठवें या बारहवें स्थान पर आ जाते हैं तो रत्न की अपेक्षा 7, 6 व 4 मुखी रुद्राक्ष धारण करना ही श्रेष्ठ है। Read more Ratan & Rudraksha


मिथुन- मिथुन लग्न के लिए बुध, शुक्र व शनि योगकारक हैं इसलिए आप पन्ना, हीरा व नीलम धारण कर सकते हैं परन्तु शुक्र द्वादशेश व शनि अष्टमेश भी है इसलिए इनका पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु 4 मुखी रुद्राक्ष भी साथ में धारण करेंगे तो पूर्ण फल प्राप्त होता है। सूर्य, चन्द्रमा व मंगल की शुभता के लिए एक, दो व तीन मुखी रुद्राक्ष धारण करें। गुरु के केन्द्राधिपति दोष के कारण गुरु का रत्न पुखराज अशुभफलदाई होता है अतः गुरु के शुभ फल हेतु रुद्राक्ष माला या पंचमुखी माला या पंचमुखी रुद्राक्ष धारण करें I Read more Ratan & Rudraksha

कर्क- कर्क लग्न के लिए चन्द्र, मंगल व गुरु योगकारक हैं इसलिए मोती, मूंगा व पुखराज धारण करना शुभ रहेगा परन्तु गुरु के षष्ठेश होने के अशुभ प्रभाव को कम करने हेतु साथ में पंचमुखी रुद्राक्ष भी धारण करना चाहिए। शनि, बुध, शुक्र इस लग्न के लिए अकारक हैं तथा सूर्य में मारक प्रभाव है अतः इनके लिए 7, 4, 6 व 1 मुखी रुद्राक्ष धारण करना ही बेहतर होगा। यदि चन्द्र, मंगल व गुरु भी अशुभ भाव में आ जाएं तो रत्न की अपेक्षा 2, 3 व पंचमुखी रुद्राक्ष पहनें। Read more Ratan & Rudraksha

सिंह- सिंह लग्न के लिए सूर्य व मंगल योगकारक हैं। अतः इनके लिए माणिक्य व मूंगा धारण करें। अष्टमेश गुरु, द्वादशेष चन्द्रमा तथा अकारक शनि, बुध व शुक्र के लिए 5, 2, 7, 4 व 6 मुखी रुद्राक्ष धारण करना शुभ रहेगा। यदि सूर्य व मंगल अशुभ भाव में स्थित हों तो इनके लिए भी 1 मुखी व 3 मुखी रुद्राक्ष ही धारण करना चाहिए। Read more Ratan & Rudraksha

कन्या- कन्या लग्न के लिए बुध, शुक्र व शनि योगकारक हैं इसलिए पन्ना, हीरा व नीलम धारण करना शुभ रहेगा परन्तु अष्टमेश शनि व द्वितीयेष शुक्र के लिए साथ में 7 व 6 मुखी रुद्राक्ष भी धारण करें। यदि बुध, शुक्र व शनि अशुभ भाव में बैठे हों तो रत्न क अपेक्षा रुद्राक्ष ही धारण करें। कन्या लग्न के लिए सूर्य, चन्द्र व मंगल अकारक हैं इसलिए इनकी शान्ति हेतु 1, 2 व 3 मुखी रुद्राक्ष धारण करें। गुरु के केन्द्राधिपति दोष के निवारणार्थ पंचमुखी रुद्राक्ष या रुद्राक्ष माला धारण करना हितकर रहेगा। Read more Ratan & Rudraksha

तुला- तुला लग्न के लिए शुक्र, शनि व बुध योगकारक हैं इसलिए हीरा, नीलम व पन्ना धारण करें। अष्टमेश शुक्र व षष्ठेष बुध के लिए इनके साथ 6 व 4 मुखी रुद्राक्ष भी धारण करना चाहिए। सूर्य, चन्द्र, मंगल व गुरु इस लग्न के लिए अकारक हैं अतः इनके लिए रत्न की अपेक्षा 1, 2, 3 व 5 मुखी रुद्राक्ष धारण करें। यदि शुक्र, शनि व बुध अशुभ भाव में बैठे हों तो रत्न की अपेक्षा 6, 7 व 4 मुखी रुद्राक्ष धारण करना ही उचित होगा। Read more Ratan & Rudraksha    


वृष्चिक- वृष्चिक लग्न के लिए सूर्य, चन्द्र, मंगल व गुरु योगकारक हैं इसलिए इनके रत्न माणिक, मोती, मूंगा व पुखराज धारण करें। मंगल के षष्ठेश होने के अशुभ प्रभाव से मुक्ति हेतु 3 मुखी रुद्राक्ष धारण करें। अकारक शनि, शुक्र व बुध के लिए 7, 6 व 4 मुखी रुद्राक्ष धारण करें। यदि सूर्य, चन्द्र एवं गुरु अशुभ भाव में स्थित हों तो इनके लिए 1, 2 व 5 मुखी रुद्राक्ष ही धारण करें। Read more Ratan & Rudraksha

धनु- धनु लग्न के लिए गुरु, सूर्य व मंगल योगकारक हैं। अतः पुखराज, माणिक्य व मूंगा धारण करें। मंगल द्वादशेश भी है इसलिए 3 मुखी रुद्राक्ष पहनना भी आवष्यक है। अष्टमेश चन्द्रमा के लिए 2 मुखी रुद्राक्ष धारण करें। अकारक शुक्र, बुध व शनि के लिए 6, 4 व 7 मुखी रुद्राक्ष धारण करना शुभत्व देता है। यदि सूर्य, मंगल व गुरु अशुभ भाव में बैठे हों तो इनके लिए 1, 3 व 5 मुखी रुद्राक्ष धारण करें I Read more Ratan & Rudraksha

मकर- मकर लग्न के लिए शनि, शुक्र व बुध योगकारक हैं अतः नीलम, हीरा व पन्ना धारण करना चाहिए। सूर्य, चन्द्र, मंगल व गुरु इस लग्न के लिए अशुभ हैं अतः 1, 2, 3 व 5 मुखी रुद्राक्ष धारण करें। यदि बुध, शुक्र व शनि अशुभ भाव में स्थित हों तो इनके लिए भी रत्न की अपेक्षा 4, 6 व 7 मुखी रुद्राक्ष धारण करें। Read more Ratan & Rudraksha

कुम्भ- कुम्भ लग्न के लिए शनि, शुक्र व बुध योगकारक हैं अतः नीलम, हीरा व पन्ना धारण करें। शनि द्वादशेश भी है और बुध भी अष्टमेश का दोष होने से ग्रसित है इसलिए रत्नों के साथ 7 व 4 मुखी रुद्राक्ष धारण करें। सूर्य, चन्द्र, मंगल व गुरु अकारक हैं अतः इनका शुभ प्रभाव प्राप्त करने के लिए 1, 2, 3 व 5 मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। यदि बुध, शुक्र व शनि अशुभ भाव में स्थित हों तो इनके लिए भी रत्न की अपेक्षा 4, 6 व 7 मुखी रुद्राक्ष धारण करें। Read more Ratan & Rudraksha

मीन- मीन लग्न के लिए शुक्र, बुध व शनि अषुभ हैं अतः इनके लिए 4, 6, व 7 मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। चन्द्र, मंगल व गुरु कारक हैं अतः इनके लिए मोती, मूंगा व पुखराज धारण करें। अशुभ भाव में स्थित होने की स्थिति में रत्न की अपेक्षा 2, 3 व 5 मुखी रुद्राक्ष धारण करना शुभ रहेगा। षष्ठेष सूर्य का शुभ प्रभाव प्राप्त करने के लिए 1 मुखी रुद्राक्ष धारण करें। Read more Ratan & Rudraksha

यदि कुण्डली में सभी ग्रह उच्च राषिस्थ, स्वराषिस्थ या वर्गोत्तमी होकर शुभ भाव में बैठे हों तो सभी ग्रहों के रत्न धारण किये जा सकते हैं। इसके विपरीत यदि सभी ग्रह नीच राषिस्थ, शत्रु राषिस्थ या नीच नवांष में स्थित होकर अषुभ भावों में स्थित हों तो इनकी शुभता हेतु 1 से 14 मुखी रुद्राक्ष धारण करें। यदि कुण्डली में अधिकांश ग्रह उच्च राशिस्थ, स्वराशिस्थ या वर्गोत्तमी होकर शुभ भाव में बैठे हों तो सभी ग्रहों के रत्न धारण किये जा सकते हैं।


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स्वप्न क्या हैं? ये क्यों आते हैं? इनका हमारे भविष्य से क्या संबंध है?
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इस संसार में प्राय: सभी मनुष्य स्वप्न देखते हैं I स्वप्न में देखी गयी हर वस्तु, दृश्य, घटना आदि का एक अर्थ अवश्य होता है I प्रकृति के द्वारा उस व्यक्ति विशेष या उससे जुडी हुई चीजों के लिए दिया गया एक संकेत होता है क्योंकि आज हमारे जीवन में जो कुछ भी अच्छी या बुरी घटना घट रही है, जिस सुख- दुःख को हम आज झेल रहे हैं वह उसके केन्द्र बिंदु से आपकी तरफ बहुत समय पहले से ही चल चुकी होती है क्योंकि ये पूरा का पूरा ब्रह्माण्ड एक निश्चित सिद्धांत पर चल रहा है I कार्य और कारण का सिद्धांत हर जगह लागू है

अर्थात्
 - आज जो कुछ भी कार्य घटित होता हुआ दिखाई दे रहा है प्रकृति की गोद में उसका कोई ना कोई कारण अवश्य है जैसे एक दिल्ली से चले हुए वाहन का गुडगाँव की तरफ से आ रहे वाहन से बीच मार्ग में टकराव हो गया तो इसमें प्रकृति की तरफ से कार्य- कारण का सिद्धांत जुड़ा हुआ था I वो एक ऐसे निश्चित समय में अपने स्थानों से चले की उस जगह पर एक निश्चित समय में पहुँचने पर दुर्घटना का सामना करना पड़ा I मार्ग में उन दोनों का हजारों वाहनों से सामना हुआ होगा परन्तु टकराव उन दोनों का ही हुआ I यदि उन दोनों के चलने के समय में थोडा सा भी परिवर्तन कर दिया जाता तो यह घटना टल सकती थी I

 एक मनुष्य जीवन में किन बीमारियों से ग्रस्त होगा ये उसके जीन (Gene) का अध्ययन करके एक वैज्ञानिक उसके जन्म से पूर्व ही बता सकता है और उस जीन के दोषों को दूर करके उस व्यक्ति को रोग मुक्त भी रख सकता है I ऐसे ही एक कुशल ज्योतिषी बच्चे की कुण्डली को देखकर उसके पूर्व जन्म के कर्मों को पहचान कर उसके भविष्य का निर्धारण कर देता है और अच्छे उपायों द्वारा उसको टाला भी जा सकता है I

ये सब इसलिए संभव है की आज की घटना आपके पास पहुँचने से अनेकों महीनों कई बार तो अनेकों वर्षों पहले से ही अपनी यात्रा प्रारम्भ कर चुकी है बस सुदूर, अनंत के गर्भ से आने वाली उस अच्छी या बुरी घटना को हमारा अवचेतन मन जोकि अत्यन्त शक्ति से सम्पन्न है हमारे बाह्य मन के सो जाने पर हमें एक दृश्य, प्रतीक आदि के रूप में दिखा देता है बस इसी का नाम स्वप्न है I

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बनाइये अपने घर के मुख्य द्वार को सुख-समृद्धि के आगमन का द्वार....
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मुख्य द्वार 

  • घर के मुख्य द्वार से हर प्रकार के अवरोध जैसे झाड़ियां, वस्तुएं, फर्नीचर इत्यादि हटा दें। 
  • मुख्य द्वार प्रकाश से जगमग रहना चाहिए, यहां हमेशा रोशनी का उचित प्रबंध होना चाहिए। फ्यूज बल्ब को तुरंत बदलने की व्यवस्था रखें। 
  • घर के मुख्य द्वार पर मांगलिक चिह्नों जैसे- ऊँ, स्वास्तिक आदि का प्रयोग करना चाहिए तथा ‘ऊँ बेल’ लटकाना चाहिए। 
  • घर में मुख्य द्वार जैसे अन्य दूसरे द्वार नहीं बनाने चाहिए तथा मुख्य द्वार को फल, पत्र, लता आदि के चित्रों से अलंकृत करना चाहिए। बृहद्वास्तुमाला में भी कहा गया है- 
मूलद्वारं नान्यैद्वारैर भिसन्दधीत रूपद्धर्या। 
     घटफलपत्रप्रथमादि भिश्च तन्मंगलैश्चिनुयात्।। 

अतः मुख्य द्वार पर कभी भी वीभत्स चित्र इत्यादि नहीं लगाना चाहिए। 

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कुंडली मिलान तथा वैवाहिक सुख
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वैवाहिक सुख के लिए कुंडली मिलान - कितना आवश्यक? हिंदू शास्त्रानुसार विवाह एक धार्मिक संबंध है। अन्य जाति वालों के अनुसार एक सामान्य संबंध है और वर्तमान में युवा पीढ़ी की धारणा और भी विपरीत है। यह संबंध बस मन का बंधन रह गया है। समाज परिवार तथा धर्म को ताक पर रखकर हर दिन विवाह होते हैं, जिसका परिणाम आज की युवा पीढ़ी भुगत भी रही है। जब तक वर वधु का मानसिक तत्व, शारीरिक तत्व, बुद्धि भेद, धार्मिक भेद आदि का परस्पर मेल नहीं हो जाता तब तक विवाह करना उचित नहीं है क्योंकि सिर्फ मन का बंधन मान लिया जाए तो मन के विषय में विद्वानों ने कहा है कि ‘‘मन के मते ना चलिए, मन में भरा विकार’’ अतः जीवन में कोई भी निर्णय लें श्रेष्ठ बुद्धि से लें जो हमें सन्मार्ग ले जाए। विवाह पूरे जीवन भर के साथ के लिए किया जाता है। अतः यह निर्णय ऋषि प्रणीत ज्योतिष शास्त्र के अनुकूल पूर्ण विचार कर करना चाहिए। भिन्न-भिन्न राशियों के भिन्न-भिन्न तत्व होते हैं अतः यदि अग्नि तत्व वाले का विवाह जल तत्व वाले से कर दिया जाए तो परिणाम यह होगा की वे दोनों एक दूसरे के आजन्म शत्रु बने रहेंगे। पाराशर, वशिष्ठ, जैमिनी, अत्रि आदि प्राचीन ऋषियों ने अपनी दिव्य दृष्टि से, अनुभवों से तथा अनेक प्रकार से जांच विचारकर निःस्वार्थ हो मनुष्य के हितार्थ बहुत सी रीतियां बना रखी हैं। उनका पालन कर हम युवा पीढ़ी को वैवाहिक सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं। बहुत लोग विवाद करते हैं कि कुंडली मिलान से बहुत सी असुविधाएं आती हैं किंतु सामान्य जन को यह बात समझ लेनी चाहिए कि हम अपनी पसंद की खरीददारी के लिए एक दुकान से दूसरी दुकान भटकते हैं और कई बार समय व धन दोनों का व्यय करते हैं। फिर विवाह जैसे बंधन जिसको जीवनभर निभाना है थोड़ा कष्ट उठाने में दुखी नहीं होना चाहिए। Read more MATCH MAKING

 वर कन्या की कुंडली मिलान में ध्यान रखने योग्य बातें:

 1. वर के सप्तम स्थान का स्वामी जिस राशि में हो, यदि वह राशि कन्या की भी हो तो विवाह उत्तम होता है।

 2. यदि कन्या की राशि वर के सप्तमेश का उच्च स्थान हो तो विवाह उत्तम होता है।

 3. वर के सप्तमेश का नीच स्थान यदि कन्या की राशि हो तो भी अच्छा होता है।

 4. वर का शुक्र जिस राशि में हो वही राशि यदि कन्या की भी हो तो भी अच्छा रहता है।

 5. वर की सप्तमस्थ राशि यदि कन्या की राशि हो तो वह विवाह अच्छा होता है।

 6. वर का लग्नेश जिस राशि में हो वही राशि यदि कन्या की भी हो तो विवाह सुखदायी होता होता है।

 7. वर के चंद्र लग्न से सप्तम स्थान में जो राशि पड़े वही राशि यदि कन्या का जन्म लग्न हो तो विवाह बहुत शुभ होता है।

 8. वर की चंद्र राशि से सप्तम स्थान पर जिन-जिन ग्रहों की दृष्टि हो, वे ग्रह जिन-जिन राशियों में बैठे हों उन राशियों में से किसी राशि में यदि कन्या का जन्म हो तो वह विवाह भी उत्तम रहता है। उपरोक्त दो नियमों का विचार कन्या की कुंडली से भी होता है। यदि वर कन्या की कुंडली में उपर्युक्त आठ नियमों में से एक भी लागू हो तो विवाह शुभ होगा, एक से अधिक हों तो सोने में सुहागा। उत्तम रीति यह होगी कि पिता अपने पुत्र की कुंडली से देखे कि वर के लिए कौन कौन सी राशि या लग्न की कन्या शुभ होगी।

ज्योतिष शास्त्र में वर्णित मेलापक (Match Making) विधि के द्वारा आइये जानिये अपने अनुरूप, भाग्य के अनुकूल जीवनसाथी I Click here for Free Online Match Making


‘कलत्र’ राशि तीन होती है। पुरूष कुंडली का सप्तमेश जिस नवांश में हो उसके स्वामी की राशि या राशियों को कलत्र कहते हैं। सप्तमाधिपति जिस राशि में उच्च का होता है वह भी कलत्र राशि होती है। सप्तम भाव का नवांश भी कलत्र राशि होती है। ज्योतिष शास्त्र का मत है कि स्त्री की जन्म राशि पुरुष के उपर्युक्त कलत्र राशियों में से किसी राशि में होना चाहिए अथवा उनकी त्रिकोणअस्थ जो राशि हो उनमें से किसी में स्त्री की जन्म राशि होना अच्छा होता है। यदि स्त्री की जन्म राशि उपर्युक्त राशियों में से किसी राशि में ना पड़ती हो तो उस स्त्री के संतान नहीं होती है। जातक परिजात के अनुसार उपर्युक्त कलत्र राशि के सिवा सप्तमेश जिस राशि में हो या उसकी त्रिकोण राशियों में से किसी में स्त्री का जन्म राशि होना शुभ बतलाया है। विवाह योग कब नहीं होता या विवाह सुख, इन दोनों योगों को भी कुंडली में विश्लेषण कर लेना चाहिए क्योंकि यदि यह योग हो तो विवाह को टालना ही उत्तम रहता है।

 1. यदि सप्तमाधिपति शुभ युक्त न होकर षष्टम, अष्टम, द्वादश भावगत हो और नीच का या अस्त हो तो वैवाहिक सुख में कमी रहती है।

2. यदि षष्टेश, अष्टमेश अथवा द्व दशेष सप्तमगत हो और उसमें शुभ ग्रह की दृष्टि या योग न हो अथवा सप्तमाधिपति 6-8-12 का स्वामी हो तो स्त्री सुख में बाधा होती है।

3. यदि सप्तमेश द्वादशगत हो और लग्नेश तथा चंद्र सप्तमस्थ हों तो भी जातक का विवाह संभव नहीं होता है।

4. यदि शुक्र और चंद्रमा साथ होकर किसी भाव में बैठे हों और शनि और मंगल उनसे सप्तम भाव में हो तो भी जातक का विवाह नहीं होता है।

 5. यदि लग्न, सप्तम तथा द्वादश में पाप ग्रह बैठे हों और पंचमस्थ चंद्रमा निर्बल हो तो उस जातक का विवाह नहीं होता है और यदि अन्य योग से विवाह भी हो जाए तो स्त्री बंध्या होगी।

6. अन्य मतानुसार द्वादश और सप्तम में दो-दो पाप ग्रह बैठे हों और पंचम में चंद्रमा हो तो जातक स्त्री-पुत्र विहीन होता है।

 7. शनि तथा चंद्रमा के सप्तमस्थ होने पर जातक का विवाह नहीं होता है और यदि होता भी है तो स्त्री बंध्या होती है।

 8. सप्तम भाव में पाप ग्रह होने पर स्त्री बंध्या होती है।

9. शुक्र तथा बुध के सप्तम में रहने से जातक कलत्र-हीन होता है। यदि शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो अधिक आयु में विवाह होता है।

10. सूर्य स्पष्ट में चार राशि तेरह अंश और बीस कला (4/13/20) जोड़कर जो राशि आवे वह धूम होता है, यदि वही सप्तम स्थान का स्पष्ट हो तो ऐसे जातक का विवाह नहीं होता है।

 11. यदि शुक्र तथा मंगल सप्तमस्थ हों तो जातक स्त्री रहित होता है। शुक्र और मंगल के नवम एवं पंचम भाव में रहने से भी वैसा फल मिलता है।

12. यदि शुक्र किसी पाप ग्रह के साथ होकर पंचम, नवम अथवा सप्तम भाव में बैठा हो तो जातक का विवाह नहीं होता है या स्त्री वियोग से पीड़ित रहता है।

13. यदि शुक्र, बुध व शनि सब के सब नीच या शत्रु नवांश में हों तो जातक स्त्री-पुत्र विहीन रहता है या दुखमय जीवन व्यतीत करता है।

उपरोक्त योग होने पर भी यदि नवांश कुंडली में वैवाहिक सुख देने वाले ग्रह उत्तम स्थिति में हों तो विवाह सुख की संभावना होती है व पूर्ण वैवाहिक सुख भी प्राप्त होता है। क्योंकि वैवाहिक सुख के लिए नवांश कुंडली का अध्ययन आवश्यक है, साथ ही महादशा, अंतर्दशा आदि का भी प्रभाव पड़ता है। अतः वर कन्या का विवाह करते समय कुंडली का सूक्ष्म विश्लेषण किसी योग्य ज्योतिषाचार्य से अवश्य करवाएं ताकि वर-वधू का वैवाहिक जीवन सुखमय हो यदि कष्ट आये भी तो सहनीय हो। 

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